कामचोर पत्नि (Kamchor Patni) | Hindi Story

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कामचोर पत्नि (Kamchor Patni ki kahani)

एक समय की बात है। एक गाँव के पास वाले रास्ते से तीन सन्त महाराज जा रहे था। वह एक-दूसरे से यह बोलते जा रहे थे कि इस गाँव में कोई भी ऐसा नही, जो हमे भोजन करा सके।

तभी उस रास्ते से रामू नाम का व्यक्ति जा रहा था और वो तीनो संतो की सुन लेता है। तब रामू बोलता है- चलिए, महाराज मैं आप लोगो को भोजन कराता हूँ।

रामू तीनो संतो को लेकर अपने घर चले जाता है और तीनो संतो को चारपाई पर बिठा देता है। रामू अपनी पत्नि को आवाज देता है। सुनीता, ओह सुनीता! तब रामू की पत्नि बोलती है- जी आई, और सुनीता घर के अन्दर से बाहर आती है।

सुनीता- बोलिए जी, बोलिये! तब रामू बोलता है तुम भोजन बनाने की तैयारी करो, मैं कुछ घर का सामान लेकर आता हूँ।

यह बात बोलकर रामू सामान लेने चला जाता है।

अब सुनीता यह सोचने लगी- हे भगवान! इनके लिए भोजन कौन बनायेगा? मैं एक काम करती हूँ कि मैं इनके सामने अनाज के कुछ दाने लेकर मुसल में फोड़ने का काम करती हूँ।

आगे सुनीता ने ऐसा ही करा, वो मुसल में कुछ अनाज के दाने लेकर फोड़ने लग गई और रोने लगी। तब सन्त महाराज सोचे! क्या हो गया, यह क्यों रोने लगी?

इन तीनो संतों में से एक ने पूछा- हे बच्ची, क्यों रो रही हो, तुम! तब सुनीता बोली, मेरे पिताजी ने मेरी शादी में सात फेरे के सात मुसल दिए थे और जब भी कोई सन्त महाराज हमारे घर आता है, तो मेरे पति इस मुसल से मारते है और तब तक नही छोड़ते, जब तक यह टूट नही जाये।

यह आखरी मुसल है। आज आप लोगो की बारी है। जब तक नही छोड़ेगे, तब तक यह टूट नही जाता। आपको अपनी जान बचानी है तो चले जाइये। तीनो सन्त वहां से चले जाते है। थोड़ी दर बाद रामू घर आता है तो रामू को सन्त नही दिखाई नही देते है।

तब रामू सुनीता से बोलता है- यहाँ से तीनो सन्त कहाँ चले गये?

तब सुनीता बोलती है- वो तीनो सन्त, मुझसे यह मुसल मांग रहे थे और मैंने मना कर दिया।
तब रामू बोलता है- दे देती मुसल, तब सुनीता बोली- मैंने तो बोला था, मेरे पति के आने के बाद ले जाना मुसल, पर वो माने नही!

तब रामू बोला- सुनीता, दे देती! अब वो लोग बिना भोजन करे चले गये ना।

तब सुनीता बोलती है- मुझसे गलती हो गई। आप उन्हें मुसल लेकर दे आइये।

रामू मुसल लकर चला जाता है और सन्त महाराज को देखते ही बोलने लगता है- ओह सन्त महाराज, मुसल ले जाइये! सन्त महाराज मुसल ले जाइये!

तब तीनों सन्त सोचने लगे कि उस बच्ची ने सही बोला था, वो हमे उस मुसल से मारेगा। यहाँ से जल्दी भागों और वो तीनो सन्त वहा से भाग जाते है। थक हारकर, रामू भी अपने घर आ जाता है। तब सुनीता बोलती है- आप मुसल देकर आये तो नही, तब रामू बोलता है कि वो तो चले गये।

तब सुनीता सोचने लगती है- चले क्यों, नही जाते! मैने तो जाने को कहा था झूठ बोलकर। यहाँ तो मेरा काम पूरा होता नही और ऊपर से उनके लिए भोजन भी मैं ही बनाती।

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